Tuesday, May 10, 2022

मेरे साईं सीरियल song - साईं वचन है lyrics

मेरे साईं सीरियल song - साईं वचन है lyrics with mp3

मेरे साईं सीरियल में हर एक गीत अति आनंददायी है और इन्हें सुनके बहोत ही अच्छा लगता है। अब इसमें एक और नया गीत जुड़ गया है जिसके लिरिक्स हैं "साईं वचन हैं".

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mer sai serial song sai vachan hai


मेरे साईं सीरियल song - "साईं वचन है" लिरिक्स


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हो अटल विश्वास जो मन में, राह समाये हर धड़कन में,

हो अटल विश्वास जो मन में, राह समाये हर धड़कन में,

हर आशा पूरी हो क्षण में,

हर आशा पूरी हो क्षण में, 

साईं वचन है।


भक्ति पथ ये सरल है भले, कर्मयोग की राह पे चले,

हो जाता है पार वो पहले, हो जाता है पार वो पहले,

साईं वचन है, साईं वचन है,

साईं वचन है, साईं वचन है, साईं वचन है।


जो जिस भाव से मुझको ध्याये, वो उस रूप में मुझको पाए, 

मैं उसको वो मुझको भाये, मैं उसको वो मुझको भाये,

साईं वचन है।

देखे मंगल सोचे मंगल, जीवन उसका होवे मंगल,

पार करे वो हर एक दलदल, पार करे वो हर एक दलदल,

साईं वचन है, साईं वचन है,

साईं वचन है, साईं वचन है, साईं वचन है।


ॐ साईं ॐ साईं ॐ साईं ॐ साईं ॐ साईं ॐ साईं ॐ


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Monday, April 11, 2022

साईं बाबा की उदी के चमत्कार

साईं बाबा की उदी के चमत्कार

साईं बाबा नित्य ईंधन इकटठा कर वे अखण्ड जलने वाली पवित्र धुनी प्रज्वलित रखा करते थे। लकडी जलने के बाद श्री बाबा बची हुई राख, जिसे ऊदी कहते थे, सभी भक्तों को विदा होने के समय प्रसाद के रूप में बाँटा करते थे।

उस समय श्री साईं बाबा की ऊदी का महत्व लोगों ने स्वीकार किया था और अभी भी वर्तमान समय में श्री साईं बाबा के हस्तस्पर्श से पुनीत हुई धूनी की ऊदी भक्तों के लिए एक अत्यन्त मूल्यवान निधि है। साईं ऊदी ने हजारों भक्तों की मानसिक तथा शारीरिक व्यथाओं को दूर करने का अद्भुत चमत्कार कर दिखाया है।

sai baba udi ke chamatkar


द्वारकामाई में निरंतर प्रज्जलित रहने वाली धूनी की विभूति अर्थात साईं की उदी के सम्बन्ध में हज़ारों लोगों को विलक्षण अनुभव हो चुके हैं। साईंभक्तों के उन्ही अनुभवों में से कुछ अनुभव यहाँ आपके साथ साझा किये गए हैं और समय समय पर और भी घटनाओ को इसमें जोड़ा जायेगा।


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1. साईं बाबा की उदी से पारसी व्यक्ति की बेटी मिर्गी रोग से मुक्त हुई

एक पारसी सज्जन की छोटी लड़की मिर्गी के रोग से ग्रस्त हो गई। बार-बार उसके हाथ-पैर ऐठ जाते और वह मूर्छित हो जाती थी। उस सज्जन ने साईं बाबा की ऊदी का प्रयोग किया और धीरे-धीरे लड़की रोग-मुक्त हो गई।


2. साईं बाबा की उदी से वृश्चिक का विष उतर गया

नासिक क्षेत्र में नारायण मोतीराम जानी नाम के एक सज्जन श्री साई महाराज के परम भक्त रामचंद्र मोडक के पास नौकरी करते थे। एक दिन अनायास ही नारायणराव को श्री बाबा के दर्शनार्थ जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। दर्शन करते समय नारायणराव की माता ने श्री बाबा से अपन पुत्र पर कृपा-दृष्टि रखने की प्रार्थना की। श्री बाबा ने नारायणराव को आशीर्वाद दत हुए कहा, "अब इसके उपरांत किसी की सेवा-चाकरी न करो। अपना ही कोई स्वतंत्र व्यवसाय आरम्भ करो।" उसी क्षण नारायणराव ने अपना नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया और नासिक में 'आनंदाश्रम' की स्थापना कर शीघ्र ही अपने व्यापार में पर्याप्त उन्नति की।

कुछ दिनों के बाद नारायणराव के इसी 'आनंदाश्रम' में उनका एक चिर-परिचित मित्र थोड़े दिन रहने के उद्देश्य से आया। एक दिन एकाएक उसे वृश्चिक ने काट लिया। वृश्चिक के काटने से होने वाली वेदना दूर करने का सामर्थ्य श्री बाबा के ऊदी में है, यह नारायणराव भली-भाँति जानते थे। अतएव वे तुरंत ही ऊदी ढूँढने लगे। पंरतु शिरडी से जो ऊदी वे लाये थे, वह समाप्त हो चुकी थी। इधर उनका मित्र असह्य वेदना से तड़प रहा था। आखिर नारायणराव ने श्री बाबा का चित्र के सम्मुख रख वहाँ एक सुगन्धित अगरबत्ती जलाई और श्री बाबा के नाम का जप करना आरम्भ कर दिया। नियम समय पर जप पूरा होने के पश्चात् चित्र के सामने पडी हुई अगरबत्ती की राख में से एक चुटकी भर राख उठाकर नारायणराव ने उसे ही श्री बाबा की ऊदी मानकर मित्र के उसी अंग पर लेप कर दिया, जहाँ वृश्चिक ने काटा था। मित्र की वेदना तुरंत बंद हो गई और वृश्चिक का विष उतर गया। नारायणराव का मित्र पूर्ववत् स्वस्थ चित्त हो गया। नारायणराव बहुत प्रसन्न हुए और श्री बाबा में उनकी भक्ति और भी दृढ़ हो गई।


3. साईं बाबा की उदी समान मिट्टी ने प्लेग का रोग दूर किया

श्री बाबा द्वारा अपने हाथों से दी हुई ऊदी का जितना गुणकारी प्रभाव होता था, उतनी ही उनके श्रद्धालु भक्तों द्वारा उनके नाम पर दी हुई भस्म भी अचूक फलदायी सिद्ध होती थी। नानासाहेब चाँदोरकर एक बार अपनी पत्नी सहित कल्याण जा रहे थे। मार्ग में ठाणा स्टेशन पर बांद्रा में रहने वाले उनका एक मित्र उन्हें मिला और बड़ी घबड़ाहट में उसने सूचित किया कि उसकी लड़की को प्लेग हो गया। नानासाहेब के पास उस समय श्री बाबा की ऊदी नहीं थी। पंरतु भक्ति और श्रद्धा से श्री बाबा का नाम स्मरण कर उन्होंने अपने पैर तले की एक चुटकी भर मिटटी लेकर अपने मित्र काद दी और उसे श्री साई महाराज के चरणों में लीन होने का आदेश दिया।

नानासाहेब के मित्र ने घर जाकर प्लेग की गुठलियों पर ऊदी का लेप लगा दिया। उसी क्षण से लडकी का ज्वर दूर होना आरम्भ हो गया और प्लेग जैसे असाध्य रोग से लड़की शीघ्र ही रोग मुक्त हो गई। साईं बाबा का केवल नाम स्मरण कर उठाई हुई मिटटी ने भी कितना अद्भुत चमत्कार कर दिखाया।

नानासाहेब चाँदोरकर ने साईं बाबा का नाम लेकर ऊदी के बदले मिट्टी देकर जिस साहस का परिचय दिया, उसका एकमेव कारण था, साईं बाबा में उनका अटूट विश्वास तथा अविचल श्रद्धा।

साईं बाबा द्वारा अपने हाथों से दी हुई उदी का जितना गुणकारी प्रभाव होता है, उतनी ही उनके श्रद्धालु भक्तों द्वारा उनके नाम पर दी हुई भस्म भी अचूक फलदायी सिद्ध होती है।


4. नानासाहेब चाँदोरकर की पुत्री का सकुशल प्रसव 

नानासाहेब चाँदोरकर जब जामनेर में तहसीलदार का पद सुशोभित कर रहे थे तो एक बार श्री बाबा की उदी का उन्हें भी विलक्षण अनुभव हुआ था। खानदेश जिले के जामनेर जैसे साधारण तथा सर्वथा अपरिचित गाँव में जब वे कार्यवश निवास कर रहे तो उन्हें एक बार अति विकट परिस्थिति का सामना करना पड़ा था। उनकी लाड़ली बेटी मैनाताई प्रसव के लिए जामनेर आई हुई थी। दिन पूरे होते ही एकाएक उसकी अवस्था गम्भीर हुई। लगातार तीन दिन प्रसव वेदना जारी रही। स्थिति में सुधार होने की संभावना दिखाई न दी ओर सभी लोग चिंता में डूब गये।

नानासाहेब तथा उनकी पत्नी ने श्री बाबा का नाम स्मरण आरम्भ किया। ठीक इसी समय शिरडी में बैठे-बैठे श्री बाबा ने अंतर्ज्ञान से जान लिया कि उनका भक्त संकट में है। उन्होंने खानदेश मे अपने गाँव जाने के लिए उद्यत एक साधु रामगीर बुवा को बुलवाया और उसे आज्ञा दी कि गाँव जाते समय मार्ग में जामनेर में थोड़ी देर ठहर कर नानासाहेब चाँदोरकर के पास ऊदी और आरती की एक प्रति पहुँचा दे। रामगीर बुवा ने नम्रता से उत्तर दिया कि उसके पास केवल दो ही रूपये बाकी है, जो जलगाव तक ही रेल का किराया चुकाने के लिए पर्याप्त है। इस पर श्री बाबा के यह का पर कि वह कोई चिंता न करे, उसकी सारी व्यवस्था हो जायेगी। 

रामगार निःसंदेह मन से श्री बाबा की आज्ञानुसार दोनों वस्तुएँ लेकर चल जलगाँव स्टेशन पर वे रात को लगभग तीन बजे उतरें। उस समय उनके पास केवल दो आने ही बचे थे। चिंता में व्याप्त हो रामगीर बुवा यह सोच ही रहे थे कि आगे क्या करना चाहिएँ कि तभी एक अपरिचित व्यक्ति ने आकर प्रश्न किया-"शिरडी का रामगीर बुवा कौन है ?" रामगीर बुवा को जब ज्ञात हुआ कि नानासाहेब ने ही उस व्यक्ति को ताँगा साथ लेकर भेजा है, तो वे उसके साथ ताँगे में बैठ जामनेर की ओर चल दिए और प्रातःकाल जामनेर पहुँचे।

गाँव की सीमा के निकट पहुँचने पर रामगीर बुवा लघुशंका से निवृत्त होने के लिए थोडी देर के लिए ताँगे में से उतरे। वापस आकर देखा तो वह मनुष्य और ताँगा दोनों ही अदृश्य हो चुके थे। इस घटना से रामगीर बुवा के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। अकेले ही समीप एक कचहरी में प्रवेश कर उन्होंने नानासाहेब के संबंध में पूछताछ की और पूछते-पूछते उनके घर पहुँच गये।

रामगीर बुवा ने नानासाहेब को बतलाया कि श्री बाबा की आज्ञा से वे शिरडी से जामनेर आये है। श्री बाबा की दी हुई ऊदी तथा आरती का कागज उन्होंने नानासाहेब को सौंप दिया। उस नानासाहेब की लड़की मैनाताई बहुत गंभीर तथा संकटपूर्ण अवस्था में थी, मानो अतिम साँसे ले रही हो। घर के सभी लोग नितांत निराश हो बैठे थे। नानासाहब ने पत्नी को बुलाकर श्री बाबा की भेजी हुई ऊदी उसके सुपुर्द कर दी। 

लडकी के कमरे में प्रवेश कर नानासाहेब की पत्नी ने घोलकर उसे पिला दी और वह स्वयं श्री बाबा की भेजी हुई आरती गाने लगी। श्री बाबा की ऊदी ने अद्भुत चमत्कार दिखाया। कुछ ही देर बाद मैनाताई कशलतापूर्वक प्रसव पीडा से मुक्त हो गई और एक संत बालक के रोने की आवाज वहाँ उपस्थित लोगों के कानों में गूँज उठी।

सभी ने अत्यन्त प्रेम और श्रद्धा से साईं के चरणों मे अपने मस्तक नत किये। रामगीर बुवा ने धन्यवाद देते हुए नानासाहेब से कहा कि उन्होंने ठीक समय पर अपना आदमी और ताँगा दिया था, इसलिये वे ठीक समय पर उपस्थित हो सके। परंत, रामगीर बुवा के ये शब्द सुनकर तो नानासाहेब अचम्भे में पड़ गए, क्योंकि ये बातें उनके ध्यान में ही नहीं आई थी। अपनी पुत्री के लिए वे इतने अधिक चिंताग्रस्त थे कि यह सब कुछ करना उनके लिए बिल्कुल असम्भव था और वैसे भी नानासाहेब ने किसी भी व्यक्ति को ताँगे के साथ स्टेशन नहीं भेजा था, क्योंकि रामगीर बुवा के जामनेर आने की कोई पूर्व सूचना तो उन्हें थी नही।

तदनंतर सभी उपस्थित लोगों ने उस गढ़वाली क्षत्रिय मनुष्य तथा उसके ताँगे की पर्याप्त खोज की। परंतु उसका कहीं भी पता न लग सका। वास्तव में प्रत्यक्ष श्री साई महाराज ही अपने भक्त के संकट निवारणार्थ वहाँ प्रकट हुए थे। श्री बाबा की लीलाएँ ऐसी ही विस्मयकारी होती थी। इस घटना से नानासाहेब का श्री बाबा में विश्वास और भी दृढ़ हो गया।


5. डॉक्टर को समझ आई साईं उदी की महिमा

मालेगाँव के एक सुप्रसिद्ध डॉक्टर का एक तरूण भतीजा हड्डी के क्षय रोग से ग्रस्त हुआ। स्वयं डॉक्टर साहब ने निजी प्रयत्नों से उसे स्वस्थ करने में कोई कसर न छोडी। अन्य प्रसिद्ध सर्जनों से विचार-विमर्श किया गया। अंतिम उपाय के रूप में उस लड़के पर शल्य-क्रिया भी की गई। पंरतु, रूपये में आना भर भी लाभ न हुआ। अंततः कुछ समझदार लोगों ने लडके के माता-पिता को किसी दैवी उपाय का आश्रय लेने का परामर्श दिया और इस अभिप्राय से ही श्री साई महाराज का उल्लेख किया।

लड़के के माता-पिता ने तुरंत ही शिरडी के लिए प्रस्थान किया और श्री बाबा के चरणों में लड़के को डालकर उसे जीवन-दान देने के लिए उनसे अनन्य भाव से प्रार्थना की। मुस्कुराते हुए लड़के की ओर देखकर श्री बाबा बोले, “इस द्वारकामाई का जिसने सहारा लिया, उसे कभी भी कोई दुःख सहन नहीं करना पड़ेगा। आप यत्किंचित चिंता न करें। ईश्वर में पूर्ण भरोसा रखो और मेरी धूनी की ऊदी का रोग-ग्रस्त स्थान पर सतत् लेप करते रहो। एक सप्ताह में लड़का रोग-मुक्त हो जायेगा।" 

लड़के संबंधियों ने श्री साईं बाबा का बताया हुआ उपचार करने का दृढ़ निश्चय किया। श्री बाबा ने लड़के को अपने पास बैठाया। उसके शरीर के रोग-ग्रस्त भाग पर प्रेम से धीरे-धीरे हाथ फेरकर और एक क्षण के लिए एकाग्रचित्त से उसकी और देखते हुए श्री बाबा पुनः बोले- “यह मस्जिद नही, वरन् प्रत्यक्ष भगवान श्रीकृष्ण की द्वारावती है। यहाँ आने से सब दुःख तथा पापों का नाश होना ही चाहिये। श्री बाबा के मुख से इतने आत्मविश्वास के साथ निकले हुए बोल असत्य कैसे सिद्ध हो सकते है ? वह लड़का केवल आठ दिनों में पूर्णतः रोग मुक्त हुआ और श्री बाबा से ऊदी प्रसाद प्राप्त कर सब लोग हर्ष-विभोर हो अपने गाँव लौट गये। लड़के को बिल्कुल स्वस्थ देख उसके चाचा को, जो स्वयं डॉक्टर थे, बडा आश्चर्य हुआ और उन्होंने इसे एक चमत्कार ही समझा।


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कुछ दिनों पश्चात् डॉक्टर साहब निजी व्यवसाय के कारण बम्बई जाने के लिए निकले। उन्होने मार्ग में शिरडी में उतरकर श्री बाबा के दर्शन करने का भी मन-ही-मन निश्चय किया। पंरतु मालेगाँव से मनमाड के मध्य मिले हुए कुछ मित्रों ने श्री बाबा के विषय में कुछ असत्य तथा मनगढन्त कहानियाँ सुनाकर उन का मन कलुषित कर दिया। अब शिरडी जाने का संकल्प त्यागकर डॉक्टर साहब सीधे बम्बई पहुँचे।

वहाँ लगातार तीन रात सपनों में डॉक्टर साहब के कानों में कोई मनुष्य चिल्लाकर “अब भी तुम्हारा मुझमें विश्वास नहीं ?" ये शब्द स्पष्टतः उच्चार करता रहा। स्वप्न में मिली हुई इस शिक्षा के बल पर डॉक्टर साहब ने शिरडी जाने का पुनः दृढ़ निश्चय किया। उस समय उनके पास उपचार के लिए आये हुए एक रोगी की अवस्था गम्भीर थी। उसका ज्वर लगातार बढ़ता ही जा रहा था। 

“मेरे रोगी का ज्वर यदि तुरंत ही दूर हुआ तो एक क्षण के लिए भी विलम्ब न कर शिरडी पहुँचूँगा” इस प्रकार मन में निश्चय कर नित्य की भाँति डॉक्टर साहब रोगी को देखने के उददेश्य से चल पड़े। आश्चर्य यह हुआ कि उस दिन रोगी को ज्वर नही आया। डॉक्टर साहब का पूर्ण समाधान हुआ। श्री बाबा कोई सामान्य व्यक्ति न होकर परमोच्च कोटि पर पहुँची हुई एक असामान्य विभूति है, यह दृढ़ भावना डॉक्टर साहब के मन में उत्पन्न हुई और उन्होंने शिक्षा पहुँचते ही नम्रता से श्री बाबा के चरणों में आत्मसमर्पण कर दिया। 

वहीं श्री बाबा ने कुछ और लीलाएँ दिखाकर, द्वारकामाई की ऊदी में कितना प्रचण्ड सामर्थ्य भरा हुआ है, यह प्रमाणों सहित सिद्ध कर दिखाया। डॉक्टर साहेब तद्नंतर श्री बाबा की सेवा में तल्लीन हुए, बहुत दिन शिरडी में रहे और ऊदी प्रसाद प्राप्त कर वापिस गाँव पहुँचे। मालेगाँव पहुँचते ही उन्हें बीजापुर में एक उच्च पद पर नियुक्त होने की सूचना मिली। भतीजे का रोग-ग्रस्त होना एक निमित्त मात्र हुआ और डॉक्टर साहब को एक परमोच्च कोटि में पहुँचे हुए सिद्ध पुरूष के सहवास का दुर्लभ अवसर मिला। यह सचमुच पूर्व जन्म का पुण्यों का फल ही समझना चाहिए।

Wednesday, January 5, 2022

नए साल २०२२ पर शिर्डी साईं दर्शन अनुभव

नए साल २०२२ पर शिर्डी साईं दर्शन अनुभव

वैसे हमारा शिरडी आना जाना तो लगा ही रहता है लेकिन साल के पहले दिन कभी भी साईं दर्शन का मौका नहीं मिला था। इस बार साईं की कृपा हुई और साल २०२२ के पहले ही दिन शिरडी जाने का प्लान बना। हम रहने के लिए नाशिक में हैं तो एक दिन में आना जाना हमारे लिए आसान था। हमें पता था की नए साल पे शिरडी में भक्तों की भारी भीड़ होती है और इस बार भी साईं भक्तों का ताँता लगा हुआ था।

shirdi sai darshan new year 2022


नाशिक से साईं प्रसादालय और साईं मंदिर तक जाने का अनुभव

१ जनवरी २०२२ सुबह ११ बजे हम नाशिक से निकले। नाशिक से शिरडी तक का २ घंटे का रस्ता है। हमने दोपहर ३ बजे दर्शन का टिकट बुक किया था। सुबह के समय भारी भीड़ होगी यह सोच कर हमने दोपहर का समय दर्शन के लिए तय किया था जब भीड़ थोड़ी कम होगी। हमेशा ही दोपहर की साईं आरती के २ घंटे के बाद भीड़ काफी कम होती है। हम दोपहर के १ बजे तक पहुंच गए दर्शन में समय था तो हम साईं प्रसादालय चले गए और वहा साईं प्रसाद ग्रहण किया। प्रसादालय में भी काफी भीड़ थी लेकिन ज्यादा समय नहीं लगा और १० मिनट्स में हमारा नंबर आ गया। प्रसादालय में भोजन ग्रहण करने के पश्चात् हम साईं समाधी मंदिर गए।

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शिर्डी में भारी भीड़ का सामना

प्रसादालय से मंदिर की तरफ जाने के लिए जो रास्ता है वो ट्रैफिक से भरा हुआ था तो ट्रैफिक पुलिस ट्रैफिक को डाइवर्ट कर रहे थे। इस वजह से हम पीछे वाले रास्ते से साईं समाधी मंदिर पहुंचे। काउंटर पर भीड़ से बचने के लिए और समय न बर्बाद हो इसलिए मोबाइल और जूते-चप्पल हमने गाड़ी में ही रख दिए। हमने फ्री दर्शन पास लिया था तो हमें गेट नंबर-2 पे जाना था। गेट नंबर १ पे ही इतनी भीड़ थी की लोग ठसाठस भरे हुए थे। सुबह सुबह ही वैष्णो  देवी में हुए भगदड़ की खबर सुनी थी लगा कही यहाँ भी वही हाल न हो जाये इसलिए वह से गेट नंबर २  तक जाने हिम्मत ही नहीं हो रही थी। पर जैसे तैसे हम भीड़ में घुसे और भली-भांति निकल भी आये और हमने चैन की सांस ली।

साईं मंदिर के सिक्योरिटी में चूक

हमने गेट नंबर २ से एंट्री ली लेकिन वहाँ पर मौजूद सिक्योरिटी ने टिकट चेक ही नहीं किया। उसके बाद जहाँ टिकट के साथ ID proof चेक किया जाता है वहाँ भी किसी ने कुछ भी चेक नहीं किया बस पेपर देख के आगे बढ़ने के लिए बोल दिया।

साईं दर्शन in Covid time

कोविद के समय में ही हमने अब तक सबसे अच्छे दर्शन किये थे क्योंकि कोविद की वजह से लोगो में अच्छा खासा अंतर होता था और लाइन निरंतर बिना रुके चलती रहती है जिससे दर्शन जल्दी हो जाते है। २०२१ में मैंने तीन बार साईं दर्शन किया और तीनो बार अच्छा अनुभव था। सभी जहाँ कोविद नियमों का पालन और अनुशासित भीड़ से साईं दर्शन बहोत ही अच्छे से हुआ है। मंदिर के बाहर भले ही कितनी भीड़ हो लेकिन मंदिर के अंदर सब कुछ बढ़िया रहता था।

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नए साल २०२२ पर साईं दर्शन

इस बार यानी कि साल २०२२ में भी भीड़ बहोत थी और मंदिर के अंदर लोगो में दूरी नहीं थी। कई जगह पर मैंने देखा कि जहाँ देखरेख के लिए मंदिर का कोई स्टाफ नहीं होता था वहां लोग आगे निकलने के लिए कही से भी लाइन तोड़ के आगे निकल जाते थे। भले ही भारी भीड़ थी लेकिन दर्शन फटाफट हो गया। आधे घंटे में हम दर्शन करके बाहर भी आ गए।

साईं मुख दर्शन के लिए भी लाइन लगी हुई थी। मुख दर्शन के लिए जो लाइन थी वह द्वारकामाई से घुमाई जा रही थी। ये अच्छा काम हो गया जिससे सभी को साईं के दर्शन हो जाते हैं। कुल मिलाकर नए साल पर साईं दर्शन का अनुभव अच्छा रहा और पहली बार नए साल के मौके पर शिर्डी आने का मौका मिला इससे मन अति प्रसन्न।

Wednesday, December 22, 2021

साईं बाबा कष्ट निवारण मंत्र - हिंदी

साईं बाबा कष्ट निवारण मंत्र - हिंदी

साईं कष्ट निवारण मंत्र का नियमित जाप करते रहने से सुख, समृद्धि और सेहत से भरपूर रहते हैं। आप किसी भी दुःख तकलीफ में हो या ना हो इस मंत्र का जाप करना चाहिए। साईं कष्ट निवारण मंत्र पढ़ते हुए पूरी तरह से साईं का ध्यान करें और साईमय हो जाये। इससे आपको साईं बाबा के पास होने की अनुभूति होगी और आप स्वयं साईं से अपनी बात कह रहे हैं ऐसा एहसास होगा।

यह भी सुनिए - साईं बावनी


sai baba kasht nivaran mantra


साईं कष्ट निवारण मंत्र lyrics in हिंदी


Play 👇 साईं कष्ट निवारण मंत्र


श्री सच्चिदानंद समर्थ सद्गुरु साईंनाथ महाराज की जय


कष्टों की काली छाया दुखदायी है, जीवन में घोर उदासी लायी है l

संकट को तालो साईं दुहाई है, तेरे सिवा न कोई सहाई है l


मेरे मन तेरी मूरत समाई है, हर पल हर शन महिमा गायी है l

घर मेरे कष्टों की आंधी आई है,आपने क्यूँ मेरी सुध भुलाई है l


तुम भोले नाथ हो दया निधान हो,तुम हनुमान हो तुम बलवान हो l

तुम्ही राम और श्याम हो,सारे जग त में तुम सबसे महान हो l


तुम्ही महाकाली तुम्ही माँ शारदे,करता हूँ प्रार्थना भव से तार दे l

तुम्ही मोहमद हो गरीब नवाज़ हो,नानक की बानी में ईसा के साथ हो l


तुम्ही दिगम्बर तुम्ही कबीर हो,हो बुध तुम्ही और महावीर हो l

सारे जगत का तुम्ही आधार हो,निराकार भी और साकार हो l


करता हूँ वंदना प्रेम विशवास से,सुनो साईं अल्लाह के वास्ते l

अधरों पे मेरे नहीं मुस्कान है,घर मेरा बनने लगा शमशान है l


रहम नज़र करो उज्ढ़े वीरान पे,जिंदगी संवरेगी एक वरदान से l

पापों की धुप से तन लगा हारने,आपका यह दास लगा पुकारने l


आपने सदा ही लाज बचाई है,देर न हो जाये मन शंकाई है l

धीरे-धीरे धीरज ही खोता है,मन में बसा विशवास ही रोता है l


मेरी कल्पना साकार कर दो,सूनी जिंदगी में रंग भर दो l

ढोते-ढोते पापों का भार जिंदगी से,मैं गया हार जिंदगी से l


नाथ अवगुण अब तो बिसारो,कष्टों की लहर से आके उबारो l

करता हूँ पाप मैं पापों की खान हूँ,ज्ञानी तुम ज्ञानेश्वर मैं अज्ञान हूँ l


करता हूँ पग-पग पर पापों की भूल मैं,तार दो जीवन ये चरणों की धूल से l

तुमने ऊजरा हुआ घर बसाया,पानी से दीपक भी तुमने जलाया l


तुमने ही शिरडी को धाम बनाया,छोटे से गाँव में स्वर्ग सजाया l

कष्ट पाप श्राप उतारो,प्रेम दया दृष्टि से निहारो l


आपका दास हूँ ऐसे न टालिए,गिरने लगा हूँ साईं संभालिये l

साईजी बालक मैं अनाथ हूँ,तेरे भरोसे रहता दिन रात हूँ l


जैसा भी हूँ , हूँ तो आपका,कीजे निवारण मेरे संताप का l

तू है सवेरा और मैं रात हूँ,मेल नहीं कोई फिर भी साथ हूँ l


साईं मुझसे मुख न मोड़ो,बीच मझधार अकेला न छोड़ो l

आपके चरणों में बसे प्राण है,तेरे वचन मेरे गुरु समान है l


आपकी राहों पे चलता दास है,ख़ुशी नहीं कोई जीवन उदास है l

आंसू की धारा में डूबता किनारा,जिंदगी में दर्द , नहीं गुज़ारा l


लगाया चमन तो फूल खिलायो,फूल खिले है तो खुशबू भी लायो l

कर दो इशारा तो बात बन जाये,जो किस्मत में नहीं वो मिल जाये l


बीता ज़माना यह गाके फ़साना,सरहदे ज़िन्दगी मौत तराना l

देर तो हो गयी है अंधेर ना हो,फ़िक्र मिले लकिन फरेब ना हो l


देके टालो या दामन बचा लो,हिलने लगी रहनुमाई संभालो l

तेरे दम पे अल्लाह की शान है,सूफी संतो का ये बयान है l


गरीबों की झोली में भर दो खजाना,ज़माने के वली करो ना बहाना l

दर के भिखारी है मोहताज है हम,शंहंशाये आलम करो कुछ करम l


तेरे खजाने में अल्लाह की रहमत,तुम सदगुरू साईं हो समरथ l

आये हो धरती पे देने सहारा,करने लगे क्यूँ हमसे किनारा l


जब तक ये ब्रह्मांड रहेगा,साईं तेरा नाम रहेगा l

चाँद सितारे तुम्हे पुकारेंगे,जन्मोजनम हम रास्ता निहारेंगे l


आत्मा बदलेगी चोले हज़ार,हम मिलते रहेंगे बारम्बार l

आपके कदमो में बैठे रहेंगे,दुखड़े दिल के कहते रहेंगे l


आपकी मर्जी है दो या ना दो,हम तो कहेंगे दामन ही भर दो l

तुम हो दाता हम है भिखारी,सुनते नहीं क्यूँ अर्ज़ हमारी l


अच्छा चलो एक बात बता दो,क्या नहीं तुम्हारे पास बता दो l

जो नहीं देना है इनकार कर दो,ख़तम ये आपस की तकरार कर दो l


लौट के खाली चला जायूँगा,फिर भी गुण तेरे गायूँगा l

जब तक काया है तब तक माया है,इसी में दुखो का मूल समाया है l


सबकुछ जान के अनजान हूँ मैं,अल्लाह की तू शान तेरी शान हूँ मैं l

तेरा करम सदा सब पे रहेगा,ये चक्र युग-युग चलता रहेगा l


जो प्राणी गायेगा साईं तेरा नाम,उसको मुक्ति मिले पहुंचे परम धाम l

ये मंत्र जो प्राणी नित दिन गायेंगे,राहू , केतु , शनि निकट ना आयेंगे l


टाल जायेंगे संकट सारे,घर में वास करें सुख सारे l

जो श्रधा से करेगा पठन,उस पर देव सभी हो प्रस्सन l


रोग समूल नष्ट हो जायेंगे,कष्ट निवारण मंत्र जो गायेंगे l

चिंता हरेगा निवारण जाप,पल में दूर हो सब पाप l


जो ये पुस्तक नित दिन बांचे,श्री लक्ष्मीजी घर उसके सदा विराजे l

ज्ञान , बुधि प्राणी वो पायेगा,कष्ट निवारण मंत्र जो धयायेगा l


ये मंत्र भक्तों कमाल करेगा,आई जो अनहोनी तो टाल देगा l

भूत-प्रेत भी रहेंगे दूर ,इस मंत्र में साईं शक्ति भरपूर l


जपते रहे जो मंत्र अगर,जादू-टोना भी हो बेअसर l

इस मंत्र में सब गुण समाये,ना हो भरोसा तो आजमाए l


ये मंत्र साईं वचन ही जानो,सवयं अमल कर सत्य पहचानो l

संशय ना लाना विशवास जगाना,ये मंत्र सुखों का है खज़ाना l


इस पुस्तक में साईं का वास,

जय श्री साईं जय श्री साईं श्री साईं l

यह भी सुनिए - दास गणु महाराज द्वारा रचित श्री साईनाथ स्तवन मंजरी

Tuesday, October 19, 2021

साईं स्तवन मंजरी lyrics and mp3 - by दास गणु महाराज

साईं स्तवन मंजरी lyrics and mp3

साईं बाबा को समर्पित अतिपावन "श्री साईनाथ स्तवन मंजरी" के लेखक दास गणु महाराज जी हैं जो एक महान कीर्तनकार और साईं बाबा के अनन्य भक्तों में से एक थे। साईं स्तवन मंजरी दास गणु की अनेक प्रसिद्द रचनाओं में से एक है जो साईं बाबा की स्तुति में लिखी गयी है। हृदयस्पर्शी साईं स्तवन मंजरी में दास गणु (एक भक्त) स्वयं को साईं बाबा (अपने गुरु व भगवान) को पूरी तरह से समर्पित करते हैं और मन को पूर्णतः शुद्ध करने की इच्छा प्रकट करते हैं। मंगलदायक साईं स्तवन मंजरी का पाठ साईभक्तों के लिए अत्यंत कल्याणकारी है।

यह भी सुनें, साईं बावनी और साईं चालीसा .

sai stavan manjari lyrics


साईं स्तवन मंजरी lyrics

ॐ गं गणपतये नमः।

ॐ श्री साई नाथाय नमः।

ह. भ. प. दास गणू कृत श्री साईनाथ स्तवन मंजरी

जानिये साईं बाबा के १०८ नाम (108 names of Sai Baba).


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श्री गणेशाय नमः ।

हे सर्वाधारा मयुरेश्वर। सर्वसाक्षी गौरीकुमरा।।

हे अचिंत्य लंबोदरा। पाहि मं श्रीगणपते ।।१।।


तूं सकल गणांचा आदि ईश। म्हणूनि म्हणती गणेश।।

तूं संमत सर्व शास्त्रांस। मंगलरूपा भालचंद्रा।।२।।


हे शारदे वाग्विलासिनी। तूं शब्द सृष्टीची स्वामींनी।।

तुझे अस्तित्व म्हणूनी। व्यवहार चालती जगताचे।।३।।


तूं ग्रंथकाराची देवता। तूं भूषण देशाचे सर्वथा।।

तुझी अवघ्यांत अगाध सत्ता। नमो तुजसी जगदंबे।।४।।


हे पूर्णब्रह्म संतप्रिय। हे सगुणरूपा पंढरीराया।।

कृपार्णवा परम सदया। पांडुरंगा नरहरे।।५।।


तूं अवघ्यांचा सूत्रधार। तुझी व्याप्त्ती जगभर।।

अवघीं शास्त्रें विचार। करिती तुझ्या स्वरूपाचा।।६।।


पुस्तकज्ञानी जे जे कोणी। त्यां तूं न गवससी चक्रपाणी।।

त्या अवघ्या मूर्खांनी। शब्दवाद करावा।।७।।


तुला जाणती एक संत। बाकीचे होती कुंठित।।

तुला माझा दंडवत। आदरें हा अष्टांगी।।८।।


हे पंचवक्त्रा शंकरा। हे नररुंडमालाधारा।।

हे नीळकंठा दिगंबर। ओंकाररुपा पशुपते।।९।।


सुनें साईं बाबा कष्ट निवारण मंत्र.


तुझें नाम ज्याचे ओठीं। त्याचें दैन्य जाय उठाउठी।।

ऐसा आहे धूर्जटी। महिमा तुझ्या नावाचा।।१०।।


तुझ्या चरणां वंदून। मी हें स्तोत्र करितों लेखन।।

यास करावें साह्य पूर्ण। तूं सर्वदा नीळकंठा।।११।।


आतां वंदूं अत्रिसुता। इंदिराकुलदैवता।।

श्रीतुकारामादि सकल संतां। तेवीं अवघ्या भाविकांसी।।१२।।


जय जयाजी साईनाथा। पतितपावन कृपावंता।।

तुझ्या पदीं ठेवितों माथा। आतां अभय असूं दे।।१३।।


तूं पुर्णब्रम्हा सौख्यधामा। तूंचि विष्णु नरोत्तम।।

अर्धांगी ती ज्याची उमा। तो कामारी तूंच की।।१४।।


तूं नरदेहधारी परमेश्वर। तूं ज्ञाननभींचा दिनकर।।

तूं दयेचा सागर। भवरोगा औषधी तूं।।१५।।


तूं हीनदीना चिंतामणी। तूं तंव भक्तां स्वर्धुनी।।

तूं बुडतीयांना भव्य तरणी। तूं भितासी आश्रय।।१६।।


जगाचें आद्य कारण। जें कां विमलचैतन्य।।

तें तुम्हीच आहा दयाघन। विश्व हा विलास तुमचाचि।।१७।।


आपण जन्मरहित। मृत्युही ना आपणांप्रत।।

तेंच अखेर कळून येत। पूर्ण विचारें शोधितां।।१८।।


जन्म आणि मरण। हीं दोन्हीं अज्ञानजन्य।।

दोहोंपासून अलिप्त आपण। मुळींच महाराजा।।१९।।


पाणी झऱ्यांत प्रगटलें। म्हणून कां तेथ उपळलें।।

ते पूर्वीच होतें पूर्ण भरलें। आले मात्र आंतुनी।।२०।।


खाचेंत आलें जीवन। म्हणूनि लाधलें अभिधान।।

झरा ऐसें तिजलागून। जलाभावीं खांचचि।।२१।।


लागला आणि आटला। हें मुळीं ठावें न जला।।

कां कीं जल खांचेला। देत नव्हतें महत्व मुळीं।।२२।।


खांचेसी मात्र अभिमान। जीवनाचा परिपूर्ण।।

म्हणून तें आटतां दारुण। दैन्यावस्था ये तिसी।।२३।।


नरदेह हि खांच खरी। शुद्ध चैतन्य विमल वारी।।

खांचा अनंत होती जरी। तरी न पालट तोयाचा।।२४।।


म्हणून अजन्मा आपणां। मी म्हणतसे दयाघना।।

अज्ञाननगाच्या कंदना। करण्या व्हावें वज्र तुम्ही।।२५।।


ऐशा खांचा आजवर। बहुत झाल्या भूमीवर।।

हल्ली अजून होणार। पुढेही कालावस्थेनें।।२६।।


या प्रत्येक खांचेप्रत। निराळें नांवरूप मिळत।।

जेणेंकरून जगतात। ओळख त्यांची पटतसे।।२७।।


आतां चैतन्याप्रत। मी - तूं म्हणणें ना उचित।।

कां कीं जेथें न संभवतें द्वैत। तेंचि चैतन्य निश्चयें।।२८।।


आणि व्याप्ती चैतन्याची। अवघ्या जगाठायीं साची।।

मग मी - तूं या भावनेची। संगत कैशी लागते।।२९।।


जल मेघगर्भीचें। एकपणें एक साचें।।

अवतरणें भूवरी होतां त्याचे। भेद होती अनेक।।३०।।


जें गोदेच्या पात्रांत। तें गोदा म्हणून वाहिले जात।।

जें पडे कूपांत। तैसी न त्याची योग्यता।।३१।।


संतरुप गोदावरी। तेथील तुम्ही आहां वारी।।

आम्ही थिल्लर कूप सरोवरी। म्हणूनि भेद तुम्हां आम्हां।।३२।।


आम्हां व्हावया कृतार्थ। आलें पाहिजे तुम्हांप्रत।।

शरण सर्वदा जोडून हात। का कीं पवित्रता तुम्हांठाई।।३३।।


पात्रामुळें पवित्रता। आली गोदा - जलासी सर्वथा।।

नुसत्या जलांत पाहतां। तें एकपणे एकचि।।३४।।


पात्र गोदावरीचें। जें कां ठरलें पवित्र साचें।।

तें ठरण्यांत भूमीचे। गुणदोष झाले साह्य पहा।।३५।।


मेघगर्भीच्या उदकाला। जो भूमिभाग न बदलवी भला।।

त्याच भूमीच्या भागाला। गोड म्हणाले शास्त्रवेत्ते।।३६।।


इतरत्र जें जल पडलें। त्यानें पदगुणा स्वीकारलें।।

रोगी कडू खारट झाले। मूळचें गोड असूनी।।३७।।


तैसें गुरुवरा आहे येथ। षड्रिपूंची न घाण जेथ।।

त्या पवित्र पिंडप्रत। संत अभिधान शोभतसे।।३८।।


म्हणून संत ती गोदावरी। मी म्हणतों साजिरी।।

अवघ्या जीवांत आहे खरी। आपुली श्रेष्ठ योग्यता।।३९।।


जगदारंभापासून। गोदा आहेच निर्माण।।

तोयही भरलें परिपूर्ण। तुटी न झाली आजवरी।।४०।।


पहा जेव्हां रावणारी। येता झाला गोदातीरीं।।

त्या वेळचें तेथील वारी। टिके कोठून आजवरी।।४१।।


पात्र मात्र तेंच उरलें। जल सागर मिळालें।।

पावित्र्य कायम राहिलें। जल-पात्रांचें आजवरी।।४२।।


प्रत्येक संवत्सरी। जुनें जाऊनि नवें वारी।।

येत पात्राभीतरीं। तोच न्याय तुम्हां ठाया।।४३।।


शतक तेंच संवत्सर। त्या शतकांतील साधुवर।।

हेंच जल साचार। नाना विभूती ह्या लाटा।।४४।।


या संतरूप गोदेसी। प्रथम संवत्सरासी।।

पूर आला निश्चयेंसीं। सनत्सनक - सनंदनाचा।।४५।।


मागून नारद तुंबर। ध्रुव प्रल्हाद बलि नृपवर।।

शबरी अंगद वायुकुमर। विदूर गोपगोपिका।।४६।।


ऐसे बहुत आजवरी। प्रत्येक शतकामाझारीं।।

पूर आले वरच्यावरी। तें वर्णण्या अशक्य मी।।४७।।


या सांप्रतच्या शतकांत। संतरुप गोदेप्रत।।

आपण पूर आलांत। साईनाथा निश्चयें।।४८।।


म्हणून तुमच्या दिव्य चरणां। मी करितों वंदना।।

महाराज माझ्या दुर्गणा। पाहूं नका किमपिही।।४९।।


मी हीन दीन अज्ञानी। पातक्यांचा शिखामणी।।

युक्त अवघ्या कुलक्षणांनी। परी अव्हेर करूं नका।।५०।।


लोहाअंगीचे दोष। मना न आणी परीस।।

गांवीच्या लेंड्या ओहोळास। गोदा न लावी परतवूनि।।५१।।


माझ्यामधील अवघी घाण। आपुल्या कृपाकटाक्षेंकरून।।

करा करा वेगें हरण। हीच विनंती दासाची।।५२।।


परिसाचा संग होऊन। लोहाचें तें लोहपण।।

जरी न हेय गुरुवरा हरण। तरी हीनत्व परिसासी।।५३।।


मला पापी ठेवूं नका। आपण हीनत्व घेऊं नका।।

आपण परीस मी लोह देखा। माझी चाड आपणातें।।५४।।


बालक अपराध सदैव करितें। परी न माता रागावते।।

हें आणून ध्यानातें। कृपाप्रसाद करावा।।५५।।


हे साईनाथ सदगुरु। तूंच माझा कल्पतरु।।

भवाब्धीचें भव्य तारुं। तूच अससी निश्चयें।।५६।।


तू कामधेनू चिंतामणी। तूं ज्ञान-नभीचा वासरमणी।।

तू सदगुणांची भव्य खाणी। अथवा सोपान स्वर्गीचा।।५७।।


हे पुण्यवंता परम पावना। हे शांतिमूर्ती आनंदघना।।

हे चित्स्वरुपा परिपूर्णा। हे भेदरहिता ज्ञानसिंधो।।५८।।


हे विज्ञानमूर्ति नरोत्तमा। हे क्षमाशांतीच्या निवासधामा।।

हे भक्तजनांच्या विश्रामा। प्रसीद प्रसीद मजप्रती।।५९।।


तूंच सदगुरु मच्छिंदर। तूच महात्मा जालंदर।।

तूं निवृत्तिनाथ ज्ञानेश्वर। कबीर शेख नाथ तूं।।६०।।


तूंच बोधला सावता। तूच रामदास तत्वतां।।

तूच तुकाराम साईनाथा। तूच सखा माणिक प्रभू।।६१।।


या आपुल्या अवताराची। परी आहे अगम्य साची।।

ओळख आपुल्या जातीची। होऊं न देतां कवणातें।।६२।।


कोणी आपणां म्हणती यवन। कोणी म्हणती ब्राह्मण।।

ऐसी कृष्णासमान। लीला आपण मांडिली।।६३।।


श्री कृष्णास पाहून। नाना प्रकारें वदले जन।।

कोणी म्हणले यदुभूषण।। कोणी म्हणाले गुराखी।।६४।।


यशोदा म्हणे सुकुमार बाळ। कंस म्हणे महाकाळ।।

उद्धव म्हणे प्रेमळ। अर्जुन म्हणे ज्ञान जेठी।।६५।।


तैसें गुरुवरा आपणांसी। जें ज्याच्या मानसी।।

योग्य वाटेल निश्चयेंसी। तें तें तुम्हा म्हणतसे।।६६।


मशीद आपुलें वसतिस्थान। विंधावांचून असती कान।।

फत्याच्या तऱ्हा पाहून। यवन म्हणणे भाग तुम्हां।।६७।।


तैसी अग्नीची उपासना। पाहुनी आपुली दयाघना।।

निश्चय होत आमुच्या मना। कीं आपण हिंदू म्हणूनी।।६८।।


परी भेद हे व्यावहारिक। यातें चाहतील तार्किक।।

परी जिज्ञासू भाविक। त्यां न वाटे महत्व यांचे।।६९।।


आपुली आहे ब्राह्मस्थिती। जात गोत ना आपणांप्रती।।

आपण अवघ्यांचे गुरुमूर्ती। आहां आद्यकारण।।७०।।


यवन-हिंदूचे विपट आलें। म्हणून तदैक्य करण्या भलें।।

मशीद-अग्नीला स्वीकारिलें। लीला भक्तांस दावावया।।७१।।


आपण जातगोतातीत। सद्वस्तु जी कां सत।।

तीच तुम्ही साक्षात। तर्कातीत साच कीं।।७२।।


तर्कवितर्कांचे घोडें। चालले किती आपणांपुढें।।

तेथें माझे बापुडे। शब्द टिकतील कोठुनी।।७३।।


पारी पाहुनी तुम्हाला। मौन न ये धरितां मला।।

कां कीं शब्द हेच स्तुतीला। साहित्य आहेत व्यवहारी।।७४।।


म्हणून शब्देकरून। जें जें होईल वर्णन।।

तें तें सर्वदा करीन। आपुल्या कृपाप्रसादें।।७५।।


संतांची योग्यता भली। देवाहून आगळी।।

अजादुजास नाही मुळीं। स्थान जवळ साधूंच्या।।७६।।


हिरण्यकश्यपु-रावणाला। देवद्वेषें मृत्यु आला।।

तैसा एकही नाही घडला। प्रकार संतहस्तानें।।७७।।


गोपीचंदे उकिरड्यासी। गाडिले जालंदरासी।।

परी त्या महात्म्यासी। नाहीं वाटला विषाद।।७८।।


उलट राजाचा उद्धार केला। चिरंजीव करुनि सोडिला।।

ऐशा संतांच्या योग्यतेला। वर्णन करावें कोठवरी।।७९।।


संत सूर्यनारायण। कृपा त्यांची प्रकाशपूर्ण।।

संत सुखद रोहिणी रमण। कौमुदी ती तत्कृपा।।८०।।


संत कस्तुरी सोज्ज्वळ। कृपा त्यांची परिमळ।।

संत इक्षु रसाळ। रसनव्हाळी तत्कृपा।।८१।।


संत सुष्टदुष्टांप्रती। समसमान निश्चिती।।

उलट पाप्यावरी प्रीती। अलोट त्यांची वसतसे।।८२।।


गोदावरीजलांत। मळकट तेंच धुवाया येत।।

निर्मळ ते संदुकींत। राहे लांब गोदेपासुनी।।८३।।


जें संदुकीमध्यें बसलें। तेंही वस्त्र एकदां आले।।

होतें धूवावया लागीं भलें। गोदावरीचे पात्रात।।८४।।


येथे संदुक वैकुंठ। गोदा तुम्ही निष्ठा घाट।।

जीवात्मे हेच पट। षडविकार मळ त्यांचा।।८५।।


तुमच्या पदाचें दर्शन। हेंच आहे गोदास्नान।।

अवघ्या मळातें घालवून। पावन करणें समर्था।।८६।।


आम्ही जन हे संसारी। मळत आहों वरच्यावरी।।

म्हणून आम्हीच अधिकारी। संतदर्शन घेण्यास्तव।।८७।।


गौतमीमाजीं विपुल नीर। आणि धुणें मळकट घाटावर।।

तैसेंच पडल्या साचार। त्यांचें हीनत्व गोदेसी।।८८।।


तुम्ही सघन शीत तरुवर। आम्ही पांथस्थ साचार।।

तापत्रयाचा हा प्रखर। तापलासे चंडाशु।।८९।।


याच्या तापापासून सदया। करा रक्षण गुरुराया।।

सत्कृपेची शीतळ छाया। आहे आपुली लोकोत्तर।।९०।।


वृक्षाखाली बैसून। जरी लागतें वरुन ऊन।।

तरी त्या तरुलागून। छायातरू कोण म्हणे।।९१।।


तुमच्या कृपेवीण पाहीं। जगांत बरें होणें नाही।।

अर्जुनाला शेषशायी। सखा लाधला धर्मास्तव।।९२।।


सुग्रीव-कृपेनें विभीषणा। साधलासे रामराणा।।

संतांमुळेंच मोठेपणा। लाधला श्रीहरीसी।।९३।।


ज्याचें वर्णन वेदांसी। न होय ऐशा ब्रह्मांसी।।

सगुण करवून भूमीसी। लाजविलें संतांनीच।।९४।।


दामाजीनें बनविला महार। वैकुंठपती रुक्मिणीवर।।

चोखोबानें उचलण्या ढोर। राबविलें त्या जगदात्मया।।९५।।


संतमहत्व जाणून। पाणी वाही जगत-जीवन।।

संत खरेच यजमान। सच्चीदानंद प्रभूचे।।९६।।


फार बोलणें न लगे आतां। तूंच आम्हा माता पिता।।

हे सदगुरु साईनाथा। शिर्डी ग्रामनिवासिया।।९७।।


बाबा तुमच्या लीलेचा। कोणा नलगे पाड साचा।।

तेथें माझी आर्ष वाचा। टिकेल सांगा कोठून।।९८।।


जड-जीवांच्या उद्धारार्थ। आपण आला शिर्डीत।।

पाणी ओतून पणत्यांत। दिवे तुम्ही जाळिले।।९९।।


सवा हात लाकडाची। फळी मंचक करुन साची।।

आपुल्या योगसामर्थ्याची। शक्ती दाविली भक्तजनां।।१००।।


वांझपणा कैकांचा। तुम्ही केलात हरण साचा।।

कित्येकांच्या रोगांचा। बिमोड केलात उदीने।।१०१।।


वारण्या ऐहिक संकटे। तुम्हां न कांही अशक्य वाटे।।

पिपीलिकेचे कोठून मोठें। ओझें मानी गजपति।।१०२।।


असो आतां गुरुराया। दिनावरी करा दया।।

मी तुमच्या लागलों पायां। मागों न लोटा मजलागीं।।१०३।।


तुम्ही महाराज राजेश्वर। तुम्ही कुबेरांचे कुबेर।।

तुम्ही वैद्यांचे वैद्य निर्धार। तुम्हांविण ना श्रेष्ठ कोणी।।१०४।।


अवांतराचे पूजेस। साहित्य आहे विशेष।।

परी पूजावया तुम्हांस। जगीं पदार्थ न राहिला।।१०५।।


पहा सूर्याचिया घरीं। सण दिपवाळी आली खरी।।

परी ती त्यानें साजिरी। करावी कोणत्या द्रव्यें।।१०६।।


सागराची शमवावया। तहान, जल ना महीं ठाया।।

वन्हीलागी शेकावया। अग्नी कोठून द्यावा तरी।।१०७।।


जे जे पदार्थ पूजेचे। ते ते तुमच्या आत्म्याचे।।

अंश आधींच असती साचे। श्रीसमर्थां गुरुराया।।१०८।।


हें तत्वदृष्टीचें बोलणे। परी न तैशी झाली मनें।।

बोललों अनुभवाविणें। शब्दजाला निरर्थक।।१०९।।


व्यावहारिक पूजन जरी। तुमचे करूं मी सांगा तरी।।

तें कराया नाहीं पदरीं। सामर्थ्य माझ्या गुरुराया।।११०।।


बहुतेक करुन कल्पना। करितों तुमच्या पूजना।।

तेंच पूजन दयाघना। मान्य करा या दासांचे।।१११।।


आतां प्रेमाश्रुकरून। तुमचे प्रक्षालितों चरण।।

सद्भक्तीचें चंदन। उगाळून लावितों।।११२।।


कफनी शब्दालंकाराची। घालितों ही तुम्हां साची।।

प्रेमभाव या सुमनाची। माळा गळ्यांत घालितों।।११३।।


धूप कुत्सितपणाचा। तुम्हांपुढे जाळितों साचा।।

जरी तो वाईट द्रव्याचा। परी न सुटेल घाण त्यासी।।११४।।


सद्गुरुविण इतरत्र। जे जे धूप जाळितात।।

त्या धूप द्रव्याचा तेथ। ऐसा प्रकार होतसे।।११५।।


धूपद्रव्यास अग्नीचा। स्पर्श होतांक्षणी साचा।।

सुवास सद्गुण तदंगीचा। जात त्याला सोडून।।११६।।


तुमच्यापुढें उलटें होतें। घाण तेवढी अग्नीत जळते ।।

सदगुण उरती पाहण्यातें । अक्षयींचे जगास ।।११७।।


मनींचें गळाल्या कुत्सितपण । मलरहित होईल मन ।।

गंगेचें गेल्यागढूळपण । मग ती पवित्र सहजचि ।।११८।।


दीप मायामोहाचा। पाजळितों मी हा साचा।।

तेणें वैराग्यप्रभेचा। होवो गुरुवरा लाभ मसी।।११९।।


शुद्ध निष्ठेचें सिंहासन। देतों बसावया कारण।।

त्याचे करुनियां ग्रहण। भक्तिनैवेद्य स्वीकारा।।१२०।।


भक्तिनैवेद्य तुम्ही खाणे। तद्र्स मला पाजणें ।।

कां कीं मी तुमचे तान्हें। पयावरी हक्क माझा ।।१२१।।


मन माझें दक्षणा। ती मी अर्पितों आपणां ।।

जेणे नुरेल कर्तेपणा। कशाचाही मजकडे ।।१२२।।


आतां प्रार्थनापूर्वक मात्र। घालितों मी दंडवत।।

तें मान्य होवो आपणांप्रत। पुण्यश्लोका साईनाथा ।।१२३।।


।। प्रार्थनाष्टक ।।

।। श्लोक ।।


शांतचित्ता महाप्रज्ञा। साईनाथा दयाघना ।।

दयासिंधो सत्स्वरुपा। मायातमविनाशना ।।१२४।।


जातगोतातीत सिद्धा। अचिंत्य करुणालया ।।

पाही मां पाही मां नाथा। शिर्डिग्रामनिवासिया ।।१२५।।


श्रीज्ञानार्क ज्ञानदात्या । सर्व मंगलकारका ।।

भक्तचित्तमराळा हे। शरणगतरक्षका ।।१२६।।


सृष्टीकर्ता विरिंची तूं। पाता तू इंदिरापती ।।

जगत्रया लया नेता। रुद्र तो तूंच निश्चितीं ।।१२७।।


तुजविणें रिता कोठें। ठाव ना या महीवरी ।।

सर्वज्ञ तूं साईनाथा। सर्वांच्या हृदयांतरी ।।१२८।।


क्षमा सर्वापराधांची। करावी हेंचि मागणें ।।

अभक्तिसंशयाच्या त्या। लाटा शीघ्र निवारणें ।।१२९।।


तूं धेनू वत्स मी तान्हें । तूं इंदू चंद्रकांत मी ।।

स्वर्णदीरुप त्वत्पादा। आदरें दास हा नमी ।।१३०।।


ठेव आतां शिरी माझ्या। कृपेचा करपंजर ।।

शोक चिंता निवारावी। गणू हा तव किंकर ।।१३१।।


या प्रार्थना प्रार्थनाष्टकेंकरून । मी करितों साष्टांग नमन ।।

पाप ताप आणि दैन्य । माझे निवारा लवलाहीं ।।१३२।।


तूं गाय मी वासरुं । तूं माय मी लेंकरुं ।।

माझेविषयी नको धरुं । कठोरता मानसी ।।१३३।।


तूं मलयागिरी चंदन । मी काटेरी झुडुप जाण ।।

तू पवित्र गोदाजीवन । मी महापातकी ।।१३४।।


तुझें दर्शन होवोनियां । दुर्बुद्धि-घाण माझे ठाया ।।

राहिल्या तैशीच गुरुराया । चंदन तुजला कोण म्हणे ।।१३५।।


कस्तुरीच्या सहवासें । मृत्तिका मोल पावतसे ।।

पुष्पासंगे घडतसे । वास सूत्रा मस्तकीं ।।१३६।।


थोरांची ती हीच रीती । ते ज्या ज्या गोष्टी ग्रहण करिती ।।

त्या त्या वस्तु पावविती । ते महत्पदा कारणें ।।१३७।।


भस्म कौपीन नंदीचा । शिवें केला संग्रह साचा ।।

म्हणून त्या वस्तूंचा । गौरव होत चहूंकडे ।।१३८।।


गोपरंजनासाठी । वृंदावनी यमुनातटी ।।

काला खेळला जगजेठी । तोही मान्य झाला बुधा ।।१३९।।


तैसा मी तो दुराचारी । परी आहें तुमच्या पदरीं ।।

म्हणून विचार अंतरी । याचा करा हो गुरुराया ।।१४०।।


ऐहिक वा पारमार्थिक । ज्या ज्या वस्तूंस मानील सुख ।।

माझे मन हे निःशंक । त्या त्या पुरविणें गुरुराया ।।१४१।।


आपुल्या कृपेने ऐसें करा । मनालागी आवरा ।।

गोड केल्यास सागरा । क्षारोदकपणाची नसे भीती ।।१४२।।


सागर गोड करण्याची । शक्ती आपणांमध्ये साची ।।

म्हणून दासगणूची । याचना ही पुरी करा ।।१४३।।


कमीपणा जो जो माझा । तो तो अवघा तुझा ।।

सिद्धांचा तूं आहेस राजा । कमीपणा न बरवा तुजसी ।।१४४।।


आतां कशास्तव बोलूं फार । तूंच माझा आधार ।।

शिशु मातेच्या कडेवर । असल्या निर्भय सहजचि ।।१४५।।


असो या स्तोत्रासी । जे जे वाचतील प्रेमेंसीं ।।

त्यांच्या त्यांच्या कामनेसी । तुम्ही पुरवा महाराजा ।।१४६।।


या स्तोत्रास आपुला वर । हाचि असो निरंतर ।।

पठणकर्त्यांचे त्रिताप दूर । व्हावे एक संवत्सरीं ।।१४७।।


शुचिर्भूत होऊन । नित्य स्तोत्र करावें पठण ।।

शुद्ध भाव ठेवून । आपुलिया मानसी ।।१४८।।


हें अशक्य असलें जरी । तरी प्रत्येक गुरुवारी ।।

सदगुरुमूर्ति अंतरी । आणून पाठ करावा ।।१४९।।


तेंही अशक्य असल्यास । प्रत्येक एकादशीस ।।

वाचणें या स्तोत्रास । कौतुक त्याचें पहावया ।।१५०।।


स्तोत्रपाठकां उत्तम गती । अंती देईल गुरुमूर्ती ।।

ऐहिक वासना सत्वरगती । ह्यांची पुरवून श्रोते हो ।।१५१।।


या स्तोत्राच्या पारायणें। मंदबुद्धि होतील शहाणे ।।

कोणा आयुष्य असल्या उणें । तो पठणें होय शतायु ।।१५२।।


धनहीनता असल्या पदरीं । कुबेर येऊन राबेल घरीं ।।

हें स्तोत्र वाचल्यावरी । सत्य सत्य त्रिवाचा ।।१५३।।


संततिहीना संतान । होईल स्तोत्र केल्या पठण ।।

स्तोत्र-पाठकाचे संपूर्ण । रोग जातील दिगंतरा ।।१५४।।


भयचिंता निवेल । मानमान्यता वाढेल ।।

अविनाश ब्रह्म कळेल । नित्य स्तोत्राच्या पारायणें ।।१५५।।


धरा बुध हो स्तोत्राविशीं । विश्वास आपुल्या मानसीं ।।

तर्कवितर्क कुकल्पनेसी । जागा मुळीं देऊ नका ।।१५६।।


शिर्डी क्षेत्राची वारी करा । पाय बाबांचे चित्तीं धरा ।।

जो अनाथांचा सोयरा । भक्तकामकल्पद्रुम ।।१५७।।


त्याच्या प्रेरणेकरून । हें स्तोत्र केलें लेखन ।।

मज पामराहातून । ऐसी रचना होय कैसी ।।१५८।।


शके अठराशें चाळीसांत । भाद्रपद शुद्ध पक्षांत ।।

तिथी गणेश-चतुर्थी सत्य । सोमवारीं द्वितीय प्रहरी ।।१५९।।


श्रीसाईनाथस्तवनमंजरी । पूर्ण झाली महेश्वरीं ।।

पुनीत नर्मदेच्या तीरीं । श्रीअहिल्येसन्निध ।।१६०।।


महेश्वर क्षेत्र भलें । स्तोत्र तेथें पूर्ण झालें ।।

प्रत्येक शब्दासी वदविलें । श्रीसाईनाथें शिरुनि मनी ।।१६१।।


लेखक शिष्य दामोदर । यास झाला साचार ।।

दासगूण मी किंकर । अवघ्या संतमहंतांचा ।।१६२।।


स्वस्ति श्रीसाईनाथस्तवनमंजरी । तारक हो भवसागरीं ।।

हेंच विनवी अत्यादरीं । दास गणू श्रीपांडुरंगा ।।१६३।।


श्रीहरीहरार्पणमस्तु। शुभं भवतु। पुंडलीकवरदा हरिविठ्ठल।।

सिताकांतस्मरण जय जय राम। पार्वतीपते हर हर महादेव।।

श्री सदगुरु साईनाथ महाराज की जय ।।

Saturday, October 16, 2021

शिर्डी साईं आश्रम भक्तिनिवास AC rooms review

शिर्डी साईं आश्रम भक्तिनिवास AC rooms review

७ अक्टूबर २०२१ में जब महाराष्ट्र के सभी मंदिर खोले गए तभी मैंने भी शिर्डी साईं बाबा के दर्शन के लिए टिकट्स बुक कर लिए और इस बार रहने के लिए साईं आश्रम भक्तनिवास का चुनाव किया। यहाँ मैंने अपने साईं आश्रम के अनुभवों को आपसे साझा किया है जो आपके लिए उपयोगी हो सकता है। पिछली बार जब हम दर्शन के लिए आये थे तब हम द्वारावती भक्तिनिवास में ठहरे थे और उसका अनुभव भी काफी अच्छा था।

यह भी पढ़ें, शिरडी यात्रा कैसे करें - रहने के व्यवस्था, भोजन, साईं दर्शन, घूमने की जगह.


sai ashram ac rooms review


साईं आश्रम Location

साईं आश्रम भक्तिनिवास साईं बाबा समाधी मंदिर से १.५ km की दूरी पर स्थित है और यह मंदिर से जुड़ी रोड पर ही स्थित है जिससे इसे ढूंढने में कोई परेशानी नहीं होती।


साईं आश्रम Infrastructure, room prices, facilities, food

साईं आश्रम भक्तनिवास संस्थान के तीनो निवासस्थानों में से सबसे बड़ा है और इसमें AC rooms, Non-AC रूम्स सब मिलाकर कुल १५३६ rooms सम्मिलित हैं। साईं आश्रम का परिसर विशाल है और यहाँ पर ओपन एयर थिएटर (OAT) भी है जहाँ लगभग २००० की संख्या में साईं भक्त एक साथ भजन कीर्तन का प्रोग्राम कर सकते हैं।

AC rooms Rs . ६०० तो non-AC rooms Rs . २५० में उपलब्ध हैं। भक्तिनिवास परिसर में चाय (Rs.3), कॉफ़ी (Rs.३), दूध (Rs.5) और पानी के बोतल (Rs.१०/लीटर) की भी सुविधा है। इन सबके अलावा सुबह का नाश्ता, दोपहर और रात का खाना भी मामूली कीमत पर प्रदान किया जाता है।भक्तिनिवास से साईं मंदिर और प्रसादालय तक आने जाने के लिए संस्थान की तरफ से निःशुल्क बस की भी व्यवस्था है।


साईं आश्रम AC रूम details

हम कुल मिलाकर ४ लोग थे, तीन वयस्क और १ बच्चा। १ AC room बुक किया Rs . ६०० में, इसमें ३ बेड थे और इसमें हमारा काम आसानी से हो गया। इसमें वेस्टर्न टॉयलेट था। AC और फैन अच्छे से काम कर रहे थे। बाथरूम में गरम पानी आ रहा था और टॉयलेट कमोड सीट में लगा जेट स्प्रे भी ठीक काम कर रहा था। शौचालय और स्नानघर सहित पूरा कमरा साफ सुथरा था।

संसथान की तरफ से प्रदान किए गए तीनों बिस्तर ठीक थे लेकिन बेडशीट, तकिए के कवर और ओढ़ने की चादर ये सब अच्छी स्थिति में नहीं थे, इसलिए मेरा सुझाव है कि आप अपने साथ पर्याप्त मात्रा में बेडशीट और ओढ़ने की चादर जरूर ले जाएं।

दो प्लास्टिक की कुर्सियां और सामान रखने के लिए रैक भी था। कुल मिलाजुलाकर Rs. ६०० में सब कुछ बढ़िया था। कमरे में अतिरिक्त व्यक्ति को समायोजित करने के लिए Rs. ५० प्रति व्यक्ति की कीमत पर अतिरिक्त बिस्तर भी मिलता है। एक कमरे में अधिकतम 5 व्यक्तियों को ठहराया जा सकता है।

साईं भक्तिनिवास से आप साईं दर्शन के लिए भी पास ले सकते हैं परन्तु Covid के चलते अभी यह सुविधा उपलब्ध नहीं है क्योंकि भक्तों की भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अभी ऑनलाइन बुकिंग को अनिवार्य किया गया है। साईं दर्शन बुकिंग के लिए यह जरूर पढ़ें - शिरडी साई बाबा मंदिर के rules and guidelines during Covid.

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Tuesday, October 5, 2021

माँ दुर्गा आरती - ॐ जय अम्बे गौरी लिरिक्स हिंदी में - mp3

माँ दुर्गा आरती - ॐ जय अम्बे गौरी लिरिक्स हिंदी में

माँ अम्बे दुर्गा देवी का ही एक रूप हैं जिन्हे भगवती के नाम से भी जाना जाता है। माँ अम्बे को ही संपूर्ण सृष्टि, सभी जीव और प्राणियों की माता कहते हैं। असुर शुम्भ - निशुम्भ और चंड - मुंड का संहार करने वाली माँ अम्बे की आरती "जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी" का पाठ करें (जिसमें माता रानी की स्तुति बहोत ही सुन्दर तरीके से की गयी है) और माँ का आशीर्वाद प्राप्त करें।

यह भी देखें, नवरात्री माँ दुर्गा के ९ रूपों के नाम, मंत्र, आरती.


jai ambe gauri lyrics hindi


ॐ जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी लिरिक्स


Play 👇 माँ दुर्गा की आरती - ॐ जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी


ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी,

तुम को निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी।

ॐ जय अम्बे गौरी।


मांग सिंदूर विराजत टीको मृगमद को,

उज्जवल से दोउ नैना चन्द्र बदन नीको।

ॐ जय अम्बे गौरी।


कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजे,

रक्त पुष्प गल माला कंठन पर साजे।

ॐ जय अम्बे गौरी।


केहरि वाहन राजत खड्ग खप्पर धारी,

सुर-नर मुनिजन सेवत तिनके दुखहारी।

ॐ जय अम्बे गौरी।


कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती,

कोटिक चन्द्र दिवाकर राजत सम ज्योति।

ॐ जय अम्बे गौरी।


शुम्भ निशुम्भ विडारे महिषासुर घाती,

धूम्र विलोचन नैना निशदिन मदमाती।

ॐ जय अम्बे गौरी।


चंड-मुंड संहारे शोणित बीज हरे,

मधु कैटभ दोऊ मारे सुर भयहीन करे।

ॐ जय अम्बे गौरी।


ब्रह्माणी रुद्राणी तुम कमला रानी,

आगम निगम बखानी तुम शिव पटरानी।

ॐ जय अम्बे गौरी।


चौसठ योगिनी गावत नृत्य करत भैरु,

बाजत ताल मृदंगा अरु बाजत डमरु।

ॐ जय अम्बे गौरी।


तुम ही जग की माता तुम ही हो भर्ता,

भक्तन की दुःख हरता सुख सम्पत्ति कर्ता।

ॐ जय अम्बे गौरी।


भुजा चार अति शोभित वर मुद्रा धारी,

मन वांछित फ़ल पावत सेवत नर-नारी।

ॐ जय अम्बे गौरी।


कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती,

श्रीमालकेतु में राजत कोटि रत्न ज्योति।

ॐ जय अम्बे गौरी।


माँ अम्बे जी की आरती जो कोई नर गावे,

कहत शिवानंद स्वामी सुख संपत्ति पावे।

ॐ जय अम्बे गौरी।


ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी,

तुम को निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी।

ॐ जय अम्बे गौरी।

सुनिए महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र - अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि

Monday, October 4, 2021

सबका साईं Title song साईंयां lyrics in Hindi (mp3)

सबका साईं वेब सीरीज - Title song साईंयां lyrics

MX Player द्वारा साईं बाबा पर आधारित हिंदी वेब सीरीज अगस्त २०२१ में प्रकाशित किया गया है जिसमें साईं बाबा के जीवन की कहानियों, चुनौतियों और उनके चमत्कारों को चित्रित किया गया है। इस वेब सीरीज का title song साइयाँ काफी लोकप्रिय है और इसके lyrics mp3 के साथ नीचे दिए गए हैं।

Also listen साईं बाबा की आरती.

sabka sai song lyrics hindi


सबका साईं Title song साईंयां लिरिक्स


Play 👇 सबका साईं Title song साईंयां


तू ही रब है तू ही सब है,

सारी दुनिया तुझमें समायी।

तू ही रब है तू ही सब है,

सारी दुनिया तुझमें समायी।

ईश्वर साईं अल्लाह साईं, सबका साईं, साइयाँ।

ईश्वर साईं अल्लाह साईं, सबका साईं, साइयाँ।


साईं साईं साईं साईं साईं साईं, 

साइयाँ, साइयाँ, साइयाँ, साइयाँ, सबका साईं साइयाँ।


सबका मालिक एक है कहता है वो,

फकीरी के आलम में रहता है वो।


सबका मालिक एक है कहता है वो,

फकीरी के आलम में रहता है वो।


मानवता है मजहब कहता है वो,

दिल में सबके रहता है वो,

भक्ति शक्ति सबके मन में, रचता है साईं।


ईश्वर साईं अल्लाह साईं, सबका साईं, साइयाँ।

ईश्वर साईं अल्लाह साईं, सबका साईं, साइयाँ।


साईं साईं साईं साईं साईं साईं, 

साइयाँ, साइयाँ, साइयाँ, साइयाँ, सबका साईं साइयाँ।


रहम करम साईं जिसपे है करता,

बिगड़ा हर काम उसका संवरता।


रहम करम साईं जिसपे है करता,

बिगड़ा हर काम उसका संवरता।


दुखियों के सब दुःख हरता,

खाली झोली सबकी भरता।


ईश्वर साईं अल्लाह साईं, सबका साईं, साइयाँ।

ईश्वर साईं अल्लाह साईं, सबका साईं, साइयाँ।


साईं साईं साईं साईं साईं साईं, 

साइयाँ, साइयाँ, साइयाँ, साइयाँ, सबका साईं साइयाँ।

Saturday, October 2, 2021

शिरडी यात्रा कैसे करें - रहने के व्यवस्था, भोजन, साईं दर्शन, घूमने की जगह

शिरडी यात्रा योजना - रहने के व्यवस्था, भोजन, साईं दर्शन, घूमने की जगह

यह लेख साईं भक्तों को शिरडी यात्रा का संपूर्ण विवरण देती है। शिरडी यात्रा की योजना बनाने से पहले आपको जिन बातों को जानना जरूरी है यहाँ पर उसका उल्लेख किया गया है। शिरडी कैसे पहुंचे, शिरडी में रहने की व्यवस्था, भोजन की व्यवस्था, साईं दर्शन के लिए पास बुकिंग, शिरडी में आस पास घूमने की जगह इत्यादि के बारे में आपको जानने को मिलेगा।

फिलहाल अभी Covid १९ के चलते State Goverment आदेशानुसार कुछ गाइडलाइन्स संस्थान द्वारा निर्धारित किये गए हैं जिनका पालन करना हर किसी के लिए अनिवार्य है।



plan shirdi travel


शिरडी कैसे पहुंचे?

शिरडी तक सड़क, ट्रेन और हवाई मार्ग से आसानी से पहुँचा जा सकता है। अगर आप आसपास के शहरों से शिरडी आ रहे हैं तो आप कार या फिर बस से यात्रा कर सकते हैं। महाराष्ट्र राज्य परिवहन की बहुत सारी बसें शिरडी और कई शहरों के बीच चलाई जा रही हैं जिनका संपूर्ण विवरण आप साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट की आधिकारिक वेबसाइट से ले सकते हैं। इसके अलावा कई प्राइवेट बसेस का भी शिरडी से कई शहरों के बीच आना जाना रहता हैं।

अगर आप ट्रेन से शिरडी आना चाहते हैं तो आपको निकटतम रेलवे स्टेशन साईंनगर, कोपरगाव, मनमाड, या फिर नागरसूल पर उतरना होगा और फिर यहाँ से टैक्सी या बस करके समाधी मंदिर तक आया जा सकता हैं। अगर आपका ट्रेन साईंनगर स्टेशन से होकर गुजरता है तो आप यहीं पर उतरें अन्यथा बाकी बताये गए स्टेशन से होकर गुजरने वाली ट्रेन से यात्रा करें।

अगर आप हवाई जहाज से यात्रा कर रहे है तो शिरडी का एकमात्र निकटतम हवाई अड्डा Shirdi International Airport (साईं बाबा समाधि मंदिर से 14 किमी की दूरी पर स्थित) है। श्री साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट की वेबसाइट से शिरडी के लिए विभिन्न ट्रेनों और उड़ानों के बारे में जानकारी ले सकते है।

शिरडी में रहने की व्यवस्था - भक्तनिवास

शिरडी में रहने के लिए आवास स्थानों की कोई कमी नहीं है। श्री साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट की तरफ से ही साईं भक्तों के लिए भक्तनिवास की व्यवस्था की गयी हैं जहाँ पर साईंभक्त कम कीमत में आराम से रह सकते हैं और निशुल्क भक्तनिवास से समाधी मंदिर और साईं प्रसादालय तक यात्रा कर सकते हैं।

साईं आश्रम, साईं बाबा भक्तनिवास और द्वारावती ये तीन भक्तनिवास हैं, यहाँ पर आपको बहुत ही सस्ते दामों पर रहने की जगह मिलती हैं। इन सभी भक्तनिवास स्थानों में सभी सुविधाओं से लैस बड़ी संख्या में कमरे उपलब्ध हैं। भक्तनिवास में रहने के लिए आपको कोशिश करना चाहिए की १ महीने पहले ही आप online बुकिंग कर लें क्योंकि यहां पर कमरे बहुत जल्दी बुक हो जाते हैं।

ज्यादा जानकारी के लिए यह ज़रूर पढ़े - शिरडी के साईं बाबा भक्तनिवास की ऑनलाइन बुकिंग

साई प्रसादालय

श्री साईं बाबा ट्रस्ट संस्थान द्वारा साईं प्रसादालय में साईं भक्तों के लिए मुफ्त या फिर कम से कम कीमत में भोजन की व्यवस्था की जाती है। साईं बाबा को भोग चढ़ाया हुआ खाना यहाँ भक्तों में वितरित किया जाता है, अगर आप शिरडी में हैं तो आपको यहाँ पर आकर साईं प्रसाद भोजन जरूर खाना चाहिए।

साईं प्रसादालय के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए यह पोस्ट जरूर पढ़ें - साई प्रसादालय भोजन, टिकट बुकिंग और समय

शिरडी यात्रा और साईं दर्शन के लिए अच्छा समय

साईं भक्तों का सालभर ही यहाँ पर ताँता लगा रहता हैं। शिरडी समाधि मंदिर में ३ त्यौहार रामनवमी, गुरु पूर्णिमा और विजयदशमी, बहुत महत्वपूर्ण तरीके से मनाये जाते हैं और इस समय शिरडी में भारी भीड़ होती है। गर्मी के मौसम में यहाँ पर तापमान अधिक होने की वजह से आप शिरडी यात्रा का संपूर्ण आनंद नहीं उठा सकेंगे इसलिए आप को बाकी मौसम जैसे की बरसात या फिर सर्दी के मौसम में यहाँ आना चाहिए जिससे आप शिरडी के साथ साथ आस पास के शहरों की यात्रा का योजना बना सकते हैं।

साईं आरती के वक़्त साईं दर्शन में लगे भक्त वहीं के वहीं रोक दिए जाते हैं जब तक आरती समाप्त ना हो जाये और इसकी वजह से साईं दर्शन में अत्यधिक समय लगता हैं। अगर आपने साईं दर्शन का निशुल्क पास लिया है तो मेरा सुझाव है कि साईं आरती के समय के १-१.५ घंटे पहले लाइन में ना लगें क्योंकि अगर आपका नंबर आने से पहले ही आरती शुरू हो गयी तो आपको बीच में ही लाइन में लगे रहना पड़ेगा। इसलिए आरती के बाद वाला समय दर्शन के लिए उचित है, दोपहर में २-३ बजे या फिर रात में ८-९ बजे। इस समय तुरंत दर्शन हो जाते हैं।

साईं दर्शन और पास

साईं दर्शन के लिए आपके पास दर्शन पास होना आवश्यक है। आप साईं दर्शन पास online साईं संस्थान के वेबसाइट से या फिर offline मंदिर के समीप स्थित पंडाल से अथवा भक्तनिवास से भी प्राप्त कर सकते हैं। निशुल्क दर्शन पास और VIP पास दोनों उपलब्ध हैं। Free पास में दर्शन में ज्यादा समय लग सकता है और VIP पास में दर्शन जल्दी हो जाते हैं।

साईं दर्शन पास लेके पहले अपने जूते-चप्पल, मोबाइल, कैमरा, सामान सब कुछ मंदिर के पास के काउंटर में जमा करके अपना रसीद ले लें और दर्शन पास में दिए हुए गेट नंबर पर जाकर आप दर्शन के लिए लाइन में लग जाइये।

दर्शन के बाद संस्थान की तरफ से बांटे जा रहे साईं की उदी और बूंदी के पैकेट जरूर ले लीजिये।

शिरडी में साईं बाबा समाधी मंदिर के पास घूमने की जगह

समाधी मंदिर के परिसर में ही ऐसी कई जगहें हैं जहाँ आप को दर्शन के बाद जरूर जाना चाहिए जैसे की गुरुस्थान (नीम का पेड़), साईं संग्रहालय, द्वारकामाई, श्री चावड़ी और मारुती मंदिर। खंडोबा मंदिर भी साईं समाधी मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित जहाँ पर आप चल कर भी जा सकते हैं।

इन सब के अलावा समाधी मंदिर से ५ मिनट की दूरी पर Wet n Joy water park और साईंतीर्थ भी है जहाँ पर जाकर आपको बहोत मज़ा आएगा। वाटर पार्क तो अभी Covid की वजह से बंद हैं लेकिन आप साईंतीर्थ जा सकते हैं। साईंतीर्थ साईं बाबा की जीवनी पर आधारित एक आध्यात्मिक थीम पार्क हैं जहाँ पर अलग अलग आध्यात्मिक प्रोग्राम दिखाए जाते हैं। उनमें से एक, लंका दहन १५ मिनट की 5D short मूवी है जो काफी मनोरंजक है और दर्शक इसे बहोत पसंद भी करते हैं।

सुप्रसिद्द शनि शिंगणापुर मंदिर साईं बाबा समाधी मंदिर से २ घंटे की दूरी पर है आप वहां भी जा सकते हैं। शिरडी के बाहर अगर आसपास के शहर घूमने की इच्छा है तो आप नाशिक जा सकते हैं जहाँ पर रामायण से जुड़ी घटनाएं घटित हुई हैं। पंचवटी, त्रयंबकेश्वर, वणी, मुक्तिधाम, पांडव लेणी इत्यादि नाशिक के जाने माने मंदिर/स्थल हैं जिनकी अपनी विशेषताएं हैं।

आपकी शिरडी यात्रा साईं बाबा की कृपा से शुभकारी, मंगलमय और सफल हो। ॐ साईं राम

Wednesday, September 29, 2021

महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र lyrics हिंदी में - अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि - महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र लिरिक्स हिंदी में

महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र माँ दुर्गा की बहुत ही सुन्दर स्तुति है और यह उनके रूप, युद्ध कौशल और उनकी महत्ता को दर्शाता है। महिषासुरमर्दिनि माँ दुर्गा का ही एक स्वरुप हैं जिन्होंने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया और इसी कारण इनका नाम महिषासुरमर्दिनि पड़ा। महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र में माँ की विभिन्न विशेषताओं दया, क्षमा, रक्षा प्रकृति का वर्णन अतिसुन्दर तरीके से किया गया है। महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र "अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि" हिंदी lyrics mp3 के साथ नीचे दिए गए है।


अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि

Play 👇 महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र - अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिन



महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र लिरिक्स हिंदी में

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते,

गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।

भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१॥


सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते,

त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते।

दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥२॥


अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते,

शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते।

मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥३॥


अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते,

रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते।

निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥४॥


अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते,

चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते।

दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥५॥


अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे,

त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे।

दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥६॥


अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते,

समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते।

शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥७॥


धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके,

कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके।

कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥८॥


सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते,

कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते।

धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥९॥


जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते,

झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते।

नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१०॥


अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते,

श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते।

सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥११॥


सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते,

विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते।

शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१२॥


अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते,

त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते।

अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१३॥


कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते,

सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले।

अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१४॥


करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते,

मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते।

निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१५॥


कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे,

प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे।

जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१६॥


विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते,

कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते।

सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१७॥


पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे,

अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्।

तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१८॥


कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्,

भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम्।

तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१९॥


तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते,

किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।

मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥२०॥


अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे,

अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते।

यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते,

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥२१॥


सुनिए माँ दुर्गा की आरती - ॐ जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी

Tuesday, September 28, 2021

माँ चंद्रघंटा मंत्र और आरती Lyrics in हिंदी with mp3

माँ चंद्रघंटा मंत्र और आरती Lyrics in हिंदी with mp3

नवरात्री के तीसरे दिन माँ दुर्गा के तीसरे रूप माँ चंद्रघंटा की उपासना की जाती है। माँ के मस्तक पर घंटे के अकार का अर्धचंद्र है और इसी वजह से इन्हें माँ चंद्रघंटा कहा जाता है। इनका वाहन सिंह है और इनका स्वरुप सुनहरा, भव्य और कल्याणकारी है। इनके १० हाथ हैं जो विभिन्न प्रकार के शस्त्र और शक्ति से सुशोभित है। इनके हाथों में कमल का फूल, कमंडल, त्रिशूल, गदा, तलवार, धनुष और बाण हैं। इसके अलावा एक हाथ आशीर्वाद मुद्रा में है, एक हाथ ह्रदय पर और एक हाथ अभय मुद्रा में है। माँ चंद्रघंटा की आराधना से अहंकार का नाश होता है और परम पद व सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

maa chandraghanta aarti lyrics hindi



माँ चंद्रघंटा मंत्र -

पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता, प्रसादम तनुते मह्यां चन्द्रघण्टेति विश्रुता।


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चंद्रघंटा माता की आरती lyrics

नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा का ध्यान,

मस्तक पर है अर्ध चन्द्र, मंद मंद मुस्कान।


दस हाथों में अस्त्र शस्त्र रखे खडग संग बाण,

घंटे के झनकार से हरती दुष्ट के प्राण।


सिंह वाहिनी दुर्गा का चमके स्वर्ण शरीर,

करती विपदा शान्ति हरो भक्त की पीर।


मधुर वाणी को बोल कर सब को देती ज्ञान,

जितने देवी देवता सभी करें सम्मान।


अपने शांत सवभाव से सबका करती ध्यान,

भव सागर में फसा हूं मैं, करो मेरा कल्याण।


नवरात्रों की मां, कृपा कर दो मां।

नवरात्रों की मां, कृपा कर दो मां।


जय माँ चंद्रघंटा, जय मां चंद्रघंटा।

जय माँ चंद्रघंटा, जय मां चंद्रघंटा।


शीशचंद्र और रूप अलौकिक हे माँ चंद्रघंटा,

घंट के नाद से पाप विनाशे,

हरती सारी विपदा, हे माँ हरती सारी विपदा।


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माँ कूष्मांडा मंत्र और आरती Lyrics in हिंदी with mp3

माँ कूष्मांडा मंत्र और आरती Lyrics in हिंदी with mp3

माँ दुर्गा के ९ रूपों में से उनका चौथा स्वरुप है माँ कूष्मांडा जिनकी नवरात्री के चौथे दिन पूजा की जाती है। इस ब्रह्मांड को एक छोटे ब्रह्मांडीय अंडे के रूप में उत्पन्न करने के कारन इनका नाम कूष्मांडा पड़ा। माँ कूष्मांडा के आठ हाथ हैं जिनमें उन्होंने कमंडल, धनुष, बाण, कमल का फूल, चक्र, गदा, अमृतकलश और जपमाला धारण किया हुआ है। इनका तेज सूर्य के समान है और इनका वाहन बाघ है। माँ कूष्मांडा की उपासना से यश, आयु और निरोग का आशीर्वाद प्राप्त होता है। माँ के भीतर समस्त संसार का सृजन समाया हुआ है।

maa kushmanda aarti lyrics hindi



माँ कूष्मांडा मंत्र -

सुरासंपूर्णकलशं,रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां,कूष्मांडा शुभदास्तु मे।।


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माँ कूष्मांडा की आरती lyrics

चौथा जब नवरात्र हो कूष्मांडा को ध्यावे,

जिसने रचा ब्रह्माण्ड ये भोजन है करवाते।


आदिशक्ति कहते जिन्हें अष्टभुजी है रूप,

इस शक्ति के तेज से कहीं छाँव कहीं धूप।


कुम्हड़े की बलि करती है तांत्रिक से स्वीकार,

मीठे से भी रीझती सात्विक करे विचार।


क्रोधित जब हो जाये ये उल्टा करे व्यवहार,

उसको रखती दूर माँ पीड़ा देती अपार।


सूर्य चंद्र की रौशनी ये जग में फैलाये,

शरण आपकी मैं आया तू ही राह दिखाए।


नवरात्रों की माँ, कृपा कर दो माँ।

नवरात्रों की माँ, कृपा कर दो माँ।


जय माँ कूष्मांडा मैया, जय माँ कूष्मांडा मैया।


मुख पर अद्भुत तेज प्रभा है हे माता कूष्मांडा,

इस ब्रह्माण्ड की रचना तुझसे तुझसे सूर्य की ऊष्मा,

हे माँ तुझसे सूर्य की ऊष्मा।


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